संस्कृति

मां नंदा की यात्रा का अनोखा प्रतीक है चौसिंग्या खाडू, चार सींगों वाला मेढ़ा करता है यात्रा की अगुवाई

Vivek Bisht · 06 सित. 2026, 05:03 PM · 241 व्यूज़

उत्तराखंड। मां नंदा देवी की राजजात यात्रा उत्तराखंड की धार्मिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं में विशेष महत्व रखती है। इस ऐतिहासिक यात्रा की सबसे अनोखी पहचान चौसिंग्या खाडू है। चार सींगों वाला यह विशेष मेढ़ा राजजात यात्रा का प्रमुख आकर्षण माना जाता है और परंपरा के अनुसार यात्रा में सबसे आगे चलता है।
हर 12 वर्ष में निकलती है नंदा देवी राजजात
नंदा देवी राजजात परंपरागत रूप से हर 12 वर्ष में आयोजित होने वाली ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा है। चमोली जिले के नौटी गांव से शुरू होने वाली यह यात्रा हिमालय के दुर्गम रास्तों से होकर आगे बढ़ती है। यात्रा में चौसिंग्या खाडू के पीछे श्रद्धालु और विभिन्न देवी-देवताओं की डोलियां चलती हैं।
मां नंदा का शुभदूत माना जाता है चौसिंग्या खाडू
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार चौसिंग्या खाडू को मां नंदा का शुभदूत और प्रतिनिधि माना जाता है। राजजात यात्रा के दौरान इसकी पीठ पर विशेष पोटली बांधी जाती है, जिसमें मां नंदा के लिए श्रृंगार सामग्री और श्रद्धालुओं द्वारा अर्पित भेंट रखी जाती है।
चार सींगों वाला यह खाडू इस यात्रा की विशिष्ट धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। श्रद्धालुओं के लिए इसका दर्शन भी विशेष आस्था से जुड़ा माना जाता है।
दुर्गम हिमालयी रास्तों से होती है यात्रा
नंदा देवी राजजात की यात्रा लगभग 280 किलोमीटर के कठिन पहाड़ी मार्ग से होकर गुजरती है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु ऊंचे हिमालयी बुग्यालों और दुर्गम रास्तों को पार करते हुए होमकुंड तक पहुंचते हैं।
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर चौसिंग्या खाडू को हिमालय की ओर विदा किया जाता है। इसी के साथ मां नंदा को उनके मायके से ससुराल की ओर विदा करने की धार्मिक भावना जुड़ी हुई है।
आस्था और संस्कृति का जीवंत प्रतीक
तस्वीर में नजर आ रहा चौसिंग्या खाडू उत्तराखंड की सदियों पुरानी धार्मिक आस्था, लोक परंपरा और हिमालयी संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। चार सींगों वाला यह विशेष मेढ़ा केवल यात्रा का हिस्सा नहीं, बल्कि मां नंदा देवी राजजात की अनूठी पहचान और गहरी धार्मिक आस्था का प्रतीक माना जाता है।

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